मेहाजी मांगलिया : लोक देवता

बाबा रामदेवः इतीहास एवं साहित्य
लेखकः प्रो (डॉ.) सोनाराम बिस्नोई

पांच पीरो मे मेहाजी एक लोकदेवता के रुपमे।

पाबू हडबु रामदे, मांगलिया मेहा ।
पांचो पीर पधारजो, गोगाजी जेहा ॥

मेहाजी मांगळिया के विषय में प्रामाणिक सामग्री के अभाव में कुछ लोगों का भ्रांतिवश नागोर परगने के ग्राम भूडल के निवासी गोपाळराज सांखला (पंवार राजपत) के पुत्र महराज सांखला को अपनी ननिहाल ग्राम खिंवसर (परगना नागौर) में नानाजी कीलूजी मांगळिया (गुहिलोत या गहलोत राजपूतों की एक शाखा या गोत्र का नाम मांगळिया है) के घर जन्म लेने तथा ननिहाल में पालन-पोषण के कारण मेहाजी मांगळिया मान लिया है, जो अप्रमाणिक एवं निराधार है।

मेहाजी मांगळिया तथा महराज सांखला के एक ही व्यक्ति मानने की इसी भ्रांति का शिकार होकर सुप्रसिद्ध विद्वान अगरचंदजी नाहटा (बीकानेर निवासी) लिखते हैं –

“मेहोजी मांगळिया और हरभूजी (हड़बूजी) सांखला ये मांगळिया उप शाखा के गहलोत क्षत्रिय जागीरदार थे। जैसलमेर के राजा ने एक बड़ी फौज लेकर इन पर चढ़ाई की, जिसमें बहादुरी के साथा काम आए।”

वस्तुतः मेहाजी कीलूजी मांगळिया के पुत्र थे। जबकि भंडेल निवासी गोपाळ राजोत महराज सांखला कीलूजी मांगळिया के दोहिते (नाती) थे। इस प्रकार मेहाजी मांगळिया और महराज सांखला परस्पर मामा-भानजा थे। मेहोजी मांगळिया का जन्म ग्राम खिंवसर में वि.सं. 1331 की श्रावण शुक्ला त्रयोदशी (सावण सुदी तेरस) वार – शुक्रवार को हुआ।
हस्तलिखित ग्रंथ ‘विगत मांगळियां री’ 4 से भी इसी तथ्य की पुष्टि होती है कि मेहाजी कीलूजी मांगळिया के पुत्र थे। इस हस्तलिखित ग्रंथ में समाविष्ट मेहाजी या का संक्षिप्त – जीवनवृत्त ऐतिहासिक दृष्टि से अपेक्षाकृत प्रामाणिक प्रतीत है। इसके अनुसार नागोर परगने का गांव खिंवसर मांगळियों (गहलोत शाखा के गजपत) ने बसाया था। गढ़ का निर्माण करवाया तथा तालाब खुदवाया।

राजपूतों के गहलोत (गुहिलोत) गोत्र की मांगळिया शाखा की छठी पीढी करणजी मांगळिया हुए, जिनके पाटवी (ज्येष्ठ) पुत्र लखोजी मांगळिया खिंवसर ठिकाणे के जागीरदार (ठाकुर) हुए।

तथा छोटा पुत्र (लखोजी का लघु भ्राता) कीलूजी मांगळिया खिंवसर छोड़कर ओसियां के पास ग्राम तापू में आकर बसे। राजस्थान के इतिहास, राजस्थानी लोक साहित्य तथा लोक संस्कृति में लोक प्रसिद्ध पांच पीरों में परिगणित मेहाजी मांगळिया इन्हीं कीलूजी मांगळिया के पुत्र थे। इस प्रकार गहलोत गोत्रिय राजपूतों की मांगळिया शाखा की आठवीं पीढ़ी में मेहाजी मांगळिया हुए। मांगळियां री विगत’ में यह भी लिखा है कि – “पछै किलूजी रा बेटा मेहोजी गांव तापू सू गायां री वार चढिया सो झगड़ो करने काम आया।’

मेहाजी मांगळिया का विवाह महवे के रावळ मालजी सलखावत की पुत्री हीरादेवी के साथ हुआ था, तथा रावळ मालजी की पोत्री (जगमाल मालावत की पुत्री) सवागदेजी की सगाई भी मेहाजी के साथ हो चुकी थी किन्तु विवाह नहीं हुआ था। मेहाजी की वीरगति के पश्चात् इन दोनों (भूआ-भतीजी) ने सत किया अर्थात् वीर गति को प्राप्त मेहाजी के दाह संस्कार के समय हीरादेवी और उसकी कंवारी भतीजी सवागदेजी दोनों ही मेहाजी के साथ सती हुई। भुआ-भतीजी के इस सत के सम्बन्ध में क्रमश: ये दूहे लोक प्रसिद्ध है, जो इस प्रसंग की पुष्टि करते हैं –

अजंस मेहवे आंणियौ, रंग वाटे राठौड़।
सत कीधौ माता सिधू, मेह वधायो मोड़।।
तथा

तथा पोती माल महवे री, लूंब रतन झड़ लाल।
सती कंवारी सवागदे, जली सिधु जगमाल।

राजस्थान के जोधपुर जिला अन्तर्गत ओसिया तहसील के ग्राम बापिणी में मेहाजी मांगळिया के मन्दिर में इन भूआ-भतीजी सतियों की भी प्रतिमाएं हैं।

मेहोजी मांगळिया द्वारा अपने गांव तापू से गांयों की वार (वाहर) चढ़ने के सम्बन्ध में यह जनश्रुति लोक प्रसिद्ध है कि जैसलमेर के भाटी दूदो-तिलोकसी (रावळ दूदाजी अर्थात् दुर्जनसाल जी तथा उनके भ्राता तिलोकसी) अजमेर के पास एक गाव की गूजरी  गायें लूट लाये। रोती बिलखती गूजरी ने अपने परिजनों को इकट्ठा किया ये लोग गायें प्राप्त करने के लिए मारवाड़ की ओर आये। ओसियां नामक ऐतिहासिक नगर से गुजरते समय इन्होंने लोगों से मेहाजी मांगळिया की महिमा सुनी। उनके सम्बन्ध में शरणागत रक्षक, गोरक्षक, निबळा थापण (निर्बलों की स्थापना) दीन दुखियों की सेवा, गौ, विप्र और अबला की सहायता आदि ‘विरुद’ सुने और उनके पराक्रम की प्रशंसा सुनी तो ये उनके गांव तापू पहुंचे तथा भाटियों द्वारा लूटकर लाई गई गायें वापिस दिलवाने हेतु याचना की, करुण पुकार की। वीर वर मेहोजी मांगळिया का हृदय इन गूजरों तथा विशेषतः अबला गूजरी के प्रति द्रवीभूत हो गया। एवं भाटियों द्वारा एक असहाय अबला के प्रति किए गये इस अत्याचार और आतंककारी आचरण एवं क्रूरता के कारण उन पर कुपित होकर वे गुजरी की गायों की वाहर चढ़े (भाटियों से युद्ध करके गूजरी की गायें उनसे छीन कर वापिस लाने हेतु प्रस्थान किया।) अपनी तलवार उठा कर अद्भुत उत्साह के साथ अश्वारूढ़ होकर तेज गति से भाटियों का पीछा किया।

ओसिया से लगभग आठ कोस दूर उत्तर-पश्चिम दिशा में स्थित ग्राम बिकमकोर’ की सीमा पर स्थित ‘झिंगोर नाडी’ के पास रातड़िया मगरा’ तक भाटी गायें लेकर पहुंचे ही थे कि प्रचण्ड योद्धा मेहाजी मांगळिया का ‘देठाळा’ भाटियों को हुआ। (भाटियों ने मेहाजी को आते हुए देखा) मेहाजी का ‘करड़-काबरा’ घोड़ा अपने इस ‘काबरे’ (काले-धोले) रंग तथा ऊंची-तगड़ी कद-काठी के कारण पूरे मारवाड़ में प्रसिद्ध था, इसलिए वे दूर से ही उन्हें पहचान गये। मेहाजी ने भाटियों को ललकारा और गायें छोड़ने के लिये कहा, किन्तु भाटी नहीं माने। कुछ लोग गायों को आगे (जैसलमेर की ओर) भगा रहे थे तो कुछ भीडूओं सहित भाटी भीड़ गये। दूदाजी का भाई त्रिलोकसी प्रचण्ड पराक्रमी था, महाबली मेहाजी ने इस ‘रण रसिये रंढाळ’ से ‘राटळ’ मचाया। इसी युद्ध के कारण ‘रातड़िया मगरा’ रणभूमि के रूप में विख्यात हुआ।

गायों के लिए प्राण-पण के साथ पूर्ण पराक्रम दिखाते हुए मेहाजी वीरगति को  प्राप्त हुए।
इस वृत्तान्त में युद्ध के कारण के सम्बन्ध में काव्यगत रूढ़ी का प्रयोग तथा कल्पना का समावेश संभावित प्रतीत होता है, परन्तु जैसलमेर के शासक के साथ युद्ध करते हुए मेहाजी मांगळिया का वीरगति को प्राप्त होना निश्चित रूप से प्रामाणिक है।(संदर्भ सूची-३)

इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा द्वारा लिखित ‘जोधपुर राज्य का इतिहास द्वारा इस युद्ध की पुष्टि होती है। ओझाजी ने मेहाजी मांगळिया के सम्बन्ध में लिखा है कि –
“यह मांगळिया जाति का राजपूत था, जो गुहिलोतों की ही एक शाखा है। कहते हैं कि यह जैसलमेर के राजा के साथ लड़ाई में वीरतापूर्वक लड़ता हुआ मारा गया था।”

गायों के लिए भाटियों के साथ मेहाजी मांगळिया के इस युद्ध के विषय में यह कहा जाता है कि दूदै – तिलोकसी के साथ मेहोजी का युद्ध दो दिन चला। कहते हैं कि दूसरे दिन प्रात: झिंगोर नाडी में स्नान हेतु आये मेहाजी ने नाडी (तालाब) की पाल पर एक साधु को पद्मासन लगा कर ध्यान मुद्रा में बैठा देखा, तो उन्होंने जाकर चरण स्पर्श किए, उसी क्षण अपने कपड़ों में छुपा कर रखी गई तलवार उठा कर मेहोजी की गर्दन काट दी गई। इस प्रकार धोखे से उन्हें मारा गया।

मुझे भाटियों के साथ मेहाजी के युद्ध सम्बन्धी इस लोक-कथा का उत्तरार्द्ध अर्थात् युद्ध के दूसरे दिन असंगत और अविश्वसनीय प्रतीत होती है। संभवतया भाटियों के प्रति नाराजगी के कारण मांगळियों द्वारा इस प्रकार की बात ‘गोडां घड़ी’ (कल्पित) है। यह न तो दूदा-तिलोकसी के लिए स्वाभाविक है और न ही मेहाजी के लिए अनुकूल। इस से न तो मेहाजी मांगळिया की महिमा बढ़ती है और न ही दूदैतिलोकसी की प्रतिष्ठा। निश्चय ही इस लोक-कथा का यह अंश अपरिपक्व मस्तिष्क की असंगत परिकल्पना है जो अनचाहे ही जनश्रुति में जुड़ गई। |

‘रातड़िये मगरे’ में दूदा-तिलोकसी के साथ गायों के लिए परम पराक्रम और वीरता पूर्वक लड़ते हुए पहले दिन ही वीरगति को प्राप्त होना विश्वसनीय, सहजस्वाभाविक तथा अपेक्षाकृत प्रामाणिक है। मेहाजी मांगळिया की वीरगति का यह ऐतिहासिक दिन वि.सं. 1352 की भादवा वदी अष्टमी है।

युद्ध में सिर (मुण्ड) कट जाने के बाद (रुण्ड) धड़ के जूझने का वर्णन भी लोककथा तथा ‘मेहोजी मांगळिया की महिमा’ काव्य कृति में मिलता है। यह वीर रसात्मक डिंगल काव्य की काव्यगति रूढ़ी भी संभव है। कहा जाता है कि बहुत देर तक मेहाजी का धड़ जुझने के बाद, स्वामीभक्त घोड़ा उस धड़ को अपनी पीठ पर मेहोजी के मुण्ड को अपने मुंह में पकड़े, अपने स्वामी के ठिकाणे तापू आ रहा था कि तापू से कुछ पहले बापिणी गांव में मेहाजी की धड़ घोड़े की पीठ से जमीनपुर गिर पड़ी, तभी घोड़े ने उनका मुण्ड भी वहीं धड़ पर गिरा दिया। यहीं पर उनके दाह संस्कार के समय उनकी पत्नी हीरादेवी तथा हीरादेवी की भतीजी (रावळ माळजी की पोती) सवागदे ने सत किया। यहीं पर इनके श्रध्धालु जनों द्रारा थान (चबूतरा) बनाया गया। प्रतिमा स्थापीत की गई। यथा समय छत्री तथा कालान्तरमें मंदीर का निर्माण हुआ। इस मंदिर में मेहाजी की प्रतिमा के साथ हिरा देवी  सवागदे की प्रतिमा स्थापीत है।

ग्राम बापिणी तथा ‘रातडीया मगरा’ दोनो ही स्थानों पर प्रति वषर भादवा वदी अष्टमी को मेहाजी मांगलिया का मेला भरता है। मांगलिया राजपूत ‘मेहा अष्टमी’ के नाम से मेहाजी की अष्टमी मनाते है। ‘मांगळियावटी’ अर्थात ओसीया तहसील में स्थित मांगलिया राजपूतो के १२ गांवो मे इनकी विशेष प्रतिष्ठा है। ये सभी मांगलियो के आराध्य तो है ही साथमें इस क्षेत्र की सभी जातीयो द्रारा लोकदेवता के रूप मे पूज्य है। इसके अतिरिक्त राजस्थान के पांच पूज्य पीरोमें इनकी गणना, इनके प्रति लोक आस्था का प्रतिक है।

क्रमश पोस्ट….

बाबा रामदेवः इतीहास एवं साहित्य
लेखकः प्रो.(डॉ.) सोनाराम बिस्नोई

पूर्व अद्य्यक्ष राजस्थानी विभाग
जयनारायण व्यास वश्व विदद्य्यालय-जोधपुर

पूर्व अद्य्यक्ष राजस्थानी भाषा
साहित्य एवं संस्कृति अकादमी-बिकानेर

प्रेषित एवं संकलन:
मयुर सिध्धपुरा- जामनगर

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