गोगाजी चौहान : लोक देवता

बाबा रामदेवः इतीहास एवं साहित्य मे से प्रस्तुती
लेखकः प्रो (डॉ.) सोनाराम बिस्नोई

पांच पीरो मे गोगाजी एक लोकदेवता के रुपमे

पाबू हडबु रामदे, मांगलिया मेहा ।
पांचो पीर पधारजो, गोगाजी जेहा ॥

‘गांव-गांव खेजड़ी अर गांव गांव गोगो’ इस लोक प्रिय लोकोक्ति से गोगा (गोगापीर) के प्रति लोक-आस्था स्वत: सिद्ध है। ये चौहान जाति के राजपूत थे तथा अपनी असाधारण वीरता, प्रणपालन और अलौकिक दैविक शक्ति के लिए लोक प्रसिद्ध हैं। इनकी पूजा सर्प देवता के रूप में होती है। हिन्दू-मुस्लिम सभी इन्हें गोगापीर के रूप में पूजते हैं।

इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने गोगाजी के विषय में लिखा है कि – ‘यह चौहान जाति का राजपूत था और अपनी असाधारण वीरता के लिए प्रसिद्ध है। बीकानेर राज्य की नौहर तहसील के गोगामेड़ी नामक गांव में इसका स्थान है जहां इसकी स्मृति में प्रतिवर्ष भाद्रपद वदी 9 को मेला लगता है।’

गोगाजी धांधू (वर्तमान में चूरु जिले में स्थित) नगर के संस्थापक चौहान वंशीय राजा धंगजी के पोत्र झेवर (जेवर) के पुत्र थे। झेवर ने ददरेवा को अपनी नई राजधानी बनाया था।

गोगाजी की माता का नाम बाछल था। मुंहता नैणसी री ख्यात भाग तीन के अनुसार पाबूजी राठौड़ की भतीजी (बूड़ाजी की पुत्री) का विवाह गोगाजी चौहान के साथ हुआ था – “तद गोगाजी नू बूडैजी री बेटी परणाई। ताहरां बाई रै दायजै री बखत किहि गायां संकळपी, किही क्युं ही संकळपियो। ताहरां पाबूजी कह्यो – बाई! हूं तोनू दोदै सूमरै री सांढा रा वरग आंण देईस।”

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पंचनद पार सिंध क्षेत्र के गांव लंकेऊ का ठाकुर दोदा सूमरा महा पराक्रमी था, जो लोक में बूढ़ा रावण के नाम से प्रसिद्ध था, उसकी सांढियों का बहुत बड़ा ‘टोळा’ भी अपनी विशालता के लिए विख्यात था, जिसे लूट कर लाना अति दुष्कर था। पाबुजी अपने सेवक हरिये राईके तथा चांदे, डेमे आदि अपने आश्रित सातों भीलों को साथ लेकर अपनी अलौकिक शक्ति से पंचनद पार कर के दोदे सूमरे की सांढियों का ‘टोळा’ लूट ददरेवै पहुंचे तथा संकल्पानुसार यह ‘टोळा’ अपनी भतीजी को दहेज के रूप में सौंपा। इस प्रसंग की पुष्टि में मुंहता नैणसी की ख्यात यह उदरण द्रष्टव्य है – “पाबूजी आघा पधारिया सो ददरेवै आया। आगै गोगाजी विराजिया, ताहरां सदा बाई सू केलण हसतो – ‘जु काको दोदै री सांढियां कद आंण देसी? इतरै हरियो आयो। आयनै कही – ‘भीतर बाई सू मालम करावो, जु पाबूजी पधारिया छै। दोदै री सांढियां रा वरग तनै संकळपाया हुता सु लाया छ। संभाळ लेवो। ताहरां गोगाजी बाहिर आय नै पाबूजी सु मिळिया। ताहरां सॉढ़िया सरब संभाळ भतीजी नू दीवी छै।’ (संदर्भ सूची-1)

प्रस्तुत प्रसंग के अतिरिक्त पाबूजी तथा गोगाजी द्वारा एक-दूसरे के दैविक व्यक्तित्व को परखने हेतु पारस्परिक चमत्कार दिखाने आदि के प्रसंग इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि गोगाजी चौहान (गोगापीर) पाबूजी और बूड़ोजी के समकालीन थे अर्थात् गोगाजी का समय विक्रम की 13-14 वीं सदी (तेरहवी सदी उत्तरार्द से चौदहवी सदी पूर्वाद्ध हैं।) वे आयु में पाबूजी से बड़े थे, यह निश्चित है।

ददरेवा की जागीरी प्राप्त करने हेतु गोगाजी के मौसेरे भाई अर्जन-सर्जन द्वारा गोगाजी के साथ युद्ध करना तथा इस युद्ध में दोनों का वीरगति को प्राप्त होना भी प्रसिद्ध है। चुरु जिले में ‘जोड़ी’ नामक ग्राम इन्हीं दो भाइयों के युगल (युगल जोड़ी) के नाम पर आबाद हुआ बताते हैं।

इतिहास विषयक लोक धारणा – अनुसार यह प्रसंग भी उल्लेखनीय है कि कुख्यात लुटेरा तथा भयंकर विदेशी आक्रान्ता महमूद गजनवी तथा गोगाजी के मध्य भयंकर युद्ध हुआ था, जिसमें पूर्ण पराक्रम दिखाते हुए अनेक आततायिओं का अंत करके गोगाजी अपने पुत्र पोत्रों के दल सहित वीर गति को प्राप्त हुए। इसी युद्ध स्थल पर वीरवर गोगाजी का समाधि स्थल है, जहां बने मंदिर को ‘गोगामेड़ी’ के नाम से जाना जाता है। इसी नाम से ‘गोगामेड़ी’ गांव आबाद है। यहीं पर पर भाद्रपद की एकम से लेकर पूनम तक (एक माह) गोगाजी का मेला लगता है। गोगामेड़ी के अतिरिक्त भी गोगाजी की राजधानी ददरेवा तथा गांव-गांव में भादवा सुदी नवम् तक कहींकहीं पर भादवा वदी नवम् को भी मेले लगते हैं, जो लोकदेवता गोगाजी (गोगापीर) के प्रति लोक आस्था के पुष्ट प्रमाण हैं।

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धर्म और संस्कृति के संरक्षक, देश भक्त और दिव्य व्यक्तित्व के स्वामी गोगाजी चौहान देवता और पीर दोनों ही रूपों में सभी सम्प्रदाओं द्वारा पूजे जाते हैं। विशेषतः सभी जातियों के सम्पूर्ण किसान वर्ग के परम आराधय है। ये लोक देवता गोगाजी, केसरिया कंवरजी, गोगापीर तथा ‘जहाज पीर’ आदि कई नामों से लोक-पूज्य है। गोगाजी में सर्प बनने की सिद्धि का उल्लेख भी लोक साहित्य में प्राप्त होता है, इसी लोक धारणा के परिणामस्वरूप इनकी प्रतिमायें सर्प देवता के रूप में भी मिलती है। प्रमुखत: ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों के खेता में तथा घरों के पास क्षमी वृक्ष (खेजड़ी)के नीचे बने स्थान (थानों) पर स्थापित गोगाजी की प्रस्तर प्रतिमायें सर्पाकृति के रूप में है।

उल्लेखनीय है कि उपर्युक्त ऐतिहासिक प्रसंगों में कालक्रम गत पारस्परिक साम्य नहीं अपितु विरोधाभास स्पष्ट रूप से प्रतीत होता है। पाबूजी और बूड़ोजी राठौड़ के समय विक्रम की 14 वीं सदी पूर्वार्द्ध है, जब कि महमूद गजनवी का समय विक्रम की 11 वीं सदी माना जाता है। अर्थात् इन दोनों प्रसंगों में से कोई एक अवश्य भ्रांतिजनक है। अत: गोगाजी का काल तथा ये प्रसंग अद्यावधि प्रामाणिक शोध का विषय है।

बाबा रामदेवः इतीहास एवं साहित्य
लेखकः प्रो.(डॉ.) सोनाराम बिस्नोई

पूर्व अद्य्यक्ष राजस्थानी विभाग
जयनारायण व्यास वश्व विदद्य्यालय-जोधपुर

पूर्व अद्य्यक्ष राजस्थानी भाषा
साहित्य एवं संस्कृति अकादमी-बिकानेर

प्रेषित एवं संकलन:
मयुर सिध्धपुरा- जामनगर

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