दिप पर्व दिपावली- दीप दर्शन और दिप वंदना

सत्य ही सर्वप्रेरक, सर्वोत्पादक और प्रकाशमय परमात्मा परमोज्योति और शांतिमय है, जैसा कि संसार में प्रकाशमान यह सूर्य है। यह सूर्य सर्वोत्पादक परमात्मा तथा अपनी कांति से सुशोभित उषा के साथ एक रहकर प्रकाश पर्व दीपावली हमें अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की प्रेरणा देता है। अतः आएँ इस दीपावली में अपने अंदर के अंधकार को हटाकर ज्ञान का दीप जलाएँ और सारे जगत को प्रकाशमय बनाएँ।

ॐ अग्रिर्ज्योतिर्ज्योतिरग्रिः स्वाहा।
सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा।
अग्रिर्वर्चो ज्योतिवर्चः स्वाहाः।
सूर्योवर्चो ज्योतिर्वर्चःस्वाहा।
ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा॥?

इसी प्रकार के वैदिक मंत्रो द्वारा सूर्यदेव की परम ज्योती स्वरुप कि प्रंशषा ‘ पञ्चमहायज्ञविधि ‘ मे हे।
ओं सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा।।१
ओं सूर्यो वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा।।२
ओं ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा।।३
ओं सजूर्देवेन सवित्रा सजूरुषसेन्द्रवत्या।
जुषाणः सूर्यो वेतु स्वाहा।।४ ?

जो सूर्यः =चराचर का आत्माज्योतिर्ज्योतिः = प्रकाशस्वरूप और सूर्यादि प्रकाश लोकों का भी प्रकाशक है। वह सूर्यः=सबका प्राणरूप परमेश्वर हैं, स्वाहा= उसकी आज्ञा पालन के लिए हम होम करते हैं।

जो सूर्यः= परमेश्वर वर्चः = हमको सब विद्याओं को देने वाला है ज्योतिर्वर्चः =और हम लोगों से उनका प्रचार कराने वाला है,स्वाहा=उसी के अनुग्रह से हम लोग अग्नि होत्र करते हैं।

जो ज्योतिः= आप प्रकाशमानसूर्यः=और जगत् का प्रकाश करने वाला सूर्यज्योतिः-अर्थात् सब संसार का ईश्वर है,स्वाहा= उसकी प्रसन्नता के अर्थ हम लोग होम करते हैं।

जो देवेन =प्रकाशक सवित्रा= सूर्यलोक और जीव सजूः= के साथ इन्द्रवत्याउषसा=सूर्यप्रकाश वाली उषा एवं जीवन की मानसिक वृत्तियों के सजूः = साथ विद्यमान परमेश्वर है, वह जुषाणः = बड़े प्रेम से सूर्यः=वही सबका आत्मा अपनी कृपा दृष्टि से हमेंवेतु=विद्यादि शुभ गुणों में विज्ञानवन् करे,स्वाहा= उसकी आज्ञा पालन के लिए हम आहुति देते हैं।

कार्त्तिक मास की अमावस्या वर्ष की बारह अमावस्याओं में अपेक्षाकृत सर्वाधिक अंधेरी होती है। इसके घने अंधकार के विषय में “मृच्छकटिक” के रचiयता संस्कृत के प्रसिद्ध कवि शूद्रक का यह श्लोक स्मरणीय है:

लिम्पतीव तमों –गानि, वर्षतीवांजनं नभ:।
असत्पुरुषसेवेव दृष्टिर्विफलतां गता।।
(अर्थात्‌ “ऐसा विदित होता है कि अंधकार अंगों पर पुत सा गया है; गगन अंजन सा बरसा रहा है। दर्शन-शक्ति इस प्रकार निष्फल हो गई है, जिस प्रकार असज्जन व्यक्ति की सेवा निष्फल हो जाती है।”)

इसी अंधकारमयी अमावस्या के आंगन में जगर-मगर दीप जल-जल कर शरद ऋतु का स्वागत करते हैं।
ॐ महालक्ष्म्यै विद्महे, विष्णुप्रियायै धीमहि।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्॥?
यह सर्व विदित और सर्वमान्य तथ्य है कि दीपावली लक्ष्मी पूजन का पर्व है। लक्ष्मी ऐश्वर्य एवं समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है। लक्ष्मी केवल उसी व्यक्ति, समाज अथवा राष्ट्र के पास रहती है. जो स्वस्थ और सशक्त होता है।

किसी भी संकट और बुरे वक्त पर विजय प्राप्त करने के साथ ही मनोकामना पूर्ण करने हेतु सबसे सरल उपाय लगता है, भगवान् के समक्ष दीप जलाना। जैसे ही दीपक का प्रकाश घर में फैलता है, हमें उस स्थान पर आध्यात्मिक ऊर्जा पूरी तरह भरी हुई महसूस होती है। इसलिए यह ज़रूरी है कि घर में जहाँ भी हमें आवश्यकता महसूस हो, दीया ज़रूर जलाना चाहिए।दिप पंचतत्व मे से एक अग्नी का प्रतीक हे और अग्नि पृथ्वी पर सूर्य का बदला हुआ रूप है

शुभं करोति कल्याणमारोग्यं धनसंपदा।
शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते ॥
दीपज्योतिः परब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः ।
दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते ॥
शुभं भवतु कल्याणभारोग्यं पुष्टि वर्धनम्।
आत्मतत्व प्रबोधाय दीप ज्योति नमोस्तुते।।

भावार्थः हे दीपक आप शुभ करने वाले हो ,हमारा कल्याण करें , आरोग्य प्रदान करके, धन-संपदा देवें। शत्रुओं की बुद्धि का नाश करें। मैं आपकी ज्योति को नमन करते हुए, आपकी स्तुति करता हूँ। हे दीप-ज्योति ! आप परम ब्रह्म स्वरुप है। हे दीप आपकी ज्योति जन का पालन करने वाली है। हे दीप आप मेरे पापों का हरण करें; हे दीप मैं आपको और आपकी पवित्र ज्योति को नमन करते हुए, आपकी स्तुति करता हूँ। शुभता प्रदान करने वाली कल्याणकारी, आरोग्य दूर कर स्वास्थ्य लाभ प्रदान करने वाली व आत्म तत्व को प्रकाशमान करने वाली दीपक की ज्योति को हृदय से नमस्कार करता हूं।

महाभारत के शान्तिपर्व का सर्वाभिवन्दित श्लोक है –
शुभं भवतु कल्याणम् आरोग्यं पुष्टिवर्धनम्,
आत्मतत्वप्रबोधाय दीपज्योति नमोऽस्तुते।

प्रज्ज्वलित प्रदीप के साथ कल्याण, आरोग्य, पुष्टि और आत्मतत्व का प्रबोध संयुक्त है। जलते हुए दीपक को अविराम साधना का प्रतीक मानते हुए उस पर अभिनन्दन के अक्षत चढ़ाना हमारी सांस्कृतिक परम्परा है। हमारी आस्तिकता प्रतिदिन संध्यादीप को प्रणाम निवेदित करते हुए उसमें परब्राह्म के प्रकाश का दर्शन करती है। शुक्ल यजुर्वेद धरती पर जलते हुए दीप में आकाश के आदित्य का ही प्रतिबिम्ब देखता है। दीप के पास मिट्टी की देह और ज्योति की आत्मा है। वह पृथ्वी और आकाश के सम्मिलन की गायत्री-गाथा है, मनुष्य का प्रतिरूप भी है क्योंकि मनुष्य में भी यही संयोजन घटित हुआ है।अतीरीक्त अनुशासन पर्व मे ‘दिपदान’ का महत्व भी हे।

हर दीपावली हमें मिट्टी के अन्तस् में जागती हुई आकाशी ज्योति का स्मरण दिलाने के लिए आती है-

वस्तुत: दीपावली अमावस के श्यामपट पर ज्योतिदीपों की अक्षरमाला अंकित करने का अनुष्ठान है, हर तरह के तमस को नि:शेष करने के लिए ज्योतिष्मती क्रान्ति का आह्वान है, दीपक की लौ के माध्यम से पृथ्वी को आकाश से जोड़ने वाला ज्योति का सोपान है।
ऋग्वेद में माना गया है कि भृगु ऋषि ने अग्नि की खोज की। वहीं से अग्नि संस्था का जन्म हुआ – इंद्र ज्योतिः अमृतं मर्तेषु ”ऋग्वेद” तथा ”सूर्यांश संभवो दीपः” अर्थात सूर्य के अंश से दीप की उत्पत्ति हुई। जीवन की पवित्रता, भक्ति, अर्चना और आशीर्वाद का दीप एक शुभ लक्षण माना जाता है। सूर्य के अंश से पृथ्वी की अग्नि को जिस पात्र में स्थापित किया गया वह आज सर्वशक्तिमान दीपक के रूप में हमारे घरों में है । घर के आंगन में तुलसी के पौधे के पास रखे दिप को रखने कि प्रथा हे।
विश्व में शायद ही ऐसा कोई देश हो जहां दीपक को लेकर इतनी अधिक कल्पनाएँ, संवेदनाएँ, साहित्य और दैनिक परंपराएँ बुनी गई हो। सम्पूर्ण भारतीय सूर्य-अग्नि तथा उसके अंशस्वरूप दीपक के चारों ओर गुंफित हैं। जन्म होते ही और मृत्यु के बाद तक भारतीय मानव का जीवन दीपक के ही समांतर चलता है। हर छोटे बड़े प्रसंग में उसकी उपस्थिति हमारे सांस्कृतिक गौरव की वृद्धि करती है। दीपक प्रकाश, जीवन और ज्ञान का प्रतीक हैं। इसके बिना सब कुछ अंधकारमय हैं। दीपक तो मर्त्य में अमर्त्य हैं। ”यो दीप ब्रम्हस्वरूपस्त्वम्” इसे हम ब्रम्हस्वरूप ही मानें।

दीपक के प्रकाश से की गई प्रार्थना का उल्लेख ऋगवेद में यूं मिलता है ।
अयं कविकविषु प्रचेता मत्र्येप्वाग्निरमृतो नि धायि।
समानो अत्र जुहुर: स्हस्व: सदा त्व्सुमनस: स्याम।।

यानी हे प्रकाश रूप परमात्मन। तुम अकवियों में कवि होकर, मृत्यों में अमृत बनकर निवास करते हो। हे प्रकाश स्वरूप तुमसे हमारा यह जीवन दुख न पाए हम हमेशा सुखी बने रहें।दीपक से हमें जीवन के उद्धर्वगामी होने, ऊंचा उठने और अंधकार को मिटा डालने की भी प्रेरणा मिलती है। इसके अलावा दीप ज्योति से पाप खत्म होते है।

बृहद आरण्यक उपनिषद में इसी लिये अंधकार से ज्योति की ओर जाने की कामना की गई है।
“असतो मा सद्गमय
तमसो मां ज्योतिर्गमय
मृत्योर्मा अमृतं गमय”

?सहयोगः शिव ओम अंबर, प्रो.हरीशंकर,पूर्णीमा वमन, विनोद चौबे ,दयानंद सरस्वती,
ज्योतिर्पर्व दिवाली नये सात्विक प्रकाशपुंज को लेकर सबका मार्ग प्रशस्त करे एसी सभी बांधवो को शुभकामना॥
प्रस्तुतीः काठी संस्कृतिदीप संस्थान☀
ऊँ दीपावल्यै नमः
श्री सूर्यदेवाय नमः
श्री गणेशाय नमः
श्री लक्ष्मी नमः
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